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विकलांग कौन ?

मई का महीना था सुरज सर पर चढता हुआ नजर आ रहा था।  गर्मी से लोगो का हाल बेहाल हो रहा था । सब अपने घर के अंदर कुलर, एसी, पँखे की हवा में बैठे हुए थे, उससे गर्मी से राहत ले रहे थे मौहल्ला बडा सुन-सान था। उस मौहल्ले से जोर- जोर से एक आवाज आ रही थी जैसे कोई वस्तु बेचने के लिए घूम रहा हो उसी बीच एक आदमी अपने घर से नीचे की ओर उस आवाज को सुनने के लिए देखता है, जो एक लकड़ी  से बनी कुर्सी पे बैठा हुआ था उसे बहुत दुर एक बच्चा दिखाई पडता है जिसकी उम्र लगभग बारह वर्षीय होगी, शरीर पर फटे-पूराने कपडे पहने थे जिसका रंग फीका था, चेहरा धूप के कारण काला हो चुका था फिर भी वो जब हँसता था तो मानो ऐसा लगता था कि वह एक गुलाब के फुल की खुशबू जैसा है जो खुशबू दूसरो को देते हुए सबके चेहरे पे रोनक आ जाए उस लड़के के साथ उसकी माँ भी थी जो अपने उस प्यारे से बच्चे को हमेशा खुश देखना चाहती थी माँ और बेटा दोनो जोर-जोर से आवाज लगा के चूड़ियो की रेड़ी को आगे धक्का देते हुए गाना गा रहे थे।
”ऐ भईया, ऐ बहना, चूड़ी वाली आई है, चौबीस रुपया दर्जन चूड़ी लेके आई है
“ऐ भईया, ऐ बहना,  चूड़ी वाली आई है, चौबीस रुपया दर्जन चूड़ी लेके आई है!”

गाना गाते हुए उस गर्मी में वह चूड़ी बेचने कि कोशिश कर रही थी लेकिन ना कोई चूड़ी बिक रही थी ओर तो ओर धुप से उन माँ-बेटे के चेहरे से पानी की वर्षा हो रही थी उनका पूरा बदन पसीने से तर-बितर हो रहा था थक हार के माँ-बेटे एक पेड़ के नीचे बैठते है जो उस आदमी के घर के ठीक सामने था वह उनको लगातार देख रहा था।
थोड़ी देर बैठने के बाद बेटा माँ से मधुर आवाज में बोलता है।
”माँ मुझे बहुत भूख लगी है और प्यास भी”
माँ को पता था उसके बच्चे ने दो दिन से कुछ भर पेट खाना नही खाया चूड़ियो की बिक्री ना होने के वजह से माँ के पास सिर्फ उसकी साड़ी के पल्लू में बंधे हुए दो रुपये थे, ना कुछ खाने के लिए था ना ही पीने के लिए था।  
माँ अपने बच्चे का मासुम सा चेहरा देखती है और फिर बोलती है
“बेटा यही बैठ मै अभी आती हूँ”
माँ अपने बच्चे को वहाँ बैठा के खाने-पीने की दुकान देखने के लिए चली जाती है लेकिन वहाँ दूर-दूर तक कोई दुकान नज़र नही आती है, अंत मे वह लोगो के दरवाजे खटखटाती है क़्योकि उसका बेटा भुखा है पर कोई अपने घर के दरवाजे नही खोलना चाहता सब अपने-अपने काम मे मगन थे। जिंदगी मे किसी को किसी की परवाह नही है। वह थक कर हारती हुई धीरे-धीरे वापस आ जाती है। उस बच्चे को दूर-दूर तक कोई चीज़ नज़र नही आती सिवाए उस आदमी के जो घर के बाहर कुर्सी पर बैठा हुआ था जो उसको काफी देर से देखे जा रहा था।
अचानक उस बच्चे की नज़र एक बोतल पर पड़ती है वह उस बोतल के पास जाता है जो खाली होती है लेकिन वह खाली बोतल देखकर निराश नही होता वह खाली बोतल के साथ खेलने लग जाता है खेलते-खेलते मन में विचार आता है कि “अभी तक मेरी माँ नही आई, वह कहाँ है ?
खेलते-खेलते वह दुर सड़क पर औरत के पास पहुचँता है जो सड़क पर लेटी है उसका मुँह जमीन की ओर है मिट्टी से पुरा बदन सना हुआ है वह पास जाकर उसके शरीर को सीधा करता हुआ उसके चेहरे की ओर देखता है जो उसकी माँ थी
बच्चा माँ का सर अपनी गोद मे लेते हुए माँ से बाते करते हुए कहता है “ माँ तु थक गई है ना चैन से सो जा मै तेरे लिए कुछ खाने को लेके आता हुँ ”
वो बच्चा माँ को छोड़ के लोगो के घर जाता है उस आदमी के पास जाता है
“ साहब जी कुछ खाने के लिए दे दो भुख लगी है मै और मेरी माँ ने कई दिनो से कुछ नही खाया है, देखो मेरी माँ कितनी थक के चैन से सो गई है ”

सबसे निराश होकर मौहल्ले मे तेज-तेज चिल्लाता है। सब इकट्ठे हो जाते हे, कोई आगे बढ के नही आता सब उसको ओर उसकी हालत को देखते है उसी बीच वह आदमी जो कुर्सी पे बैठ कर शुरु से पूरी घटना को देख रहा था वह आदमी समझ चुका था कि उसकी माँ इस दुनिया मे नही रही वह उस बच्चे को गले लगना चाहता था उनकी मदद करने के लिए बैचेन था पर वह शरीर से विकलांग था जो चल फिर और बोल नही सकता था वह आदमी मन ही मन रोता है वह सोचता है कि ये समाज मेरी तरह ही विकलांग है जो सब कुछ देखते हुए भी कुछ नही देखते , बोलते हुए भी गुंगो की तरह रहते है और हाथ पैर होते हुए भी मुझ जैसे विकलांग है। 

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